17 CCA: Rajasthan Minor Penalty Procedure Easy Explained

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Rule 17 CCA Rules Rajasthan: 1958 नियम 17 लघु शास्ति विभागीय प्रक्रिया, परिनिन्दा (Censure), वेतन वृद्धि स्थगन एवं DPC पर प्रभाव

राजस्थान सरकार के अधीन सेवारत राज्य कर्मचारियों एवं अधिकारियों के सेवा आचरण, कर्तव्य निर्वहन में लापरवाही, प्रक्रियात्मक त्रुटि अथवा अपेक्षाकृत कम गंभीर कदाचार के मामलों में राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1958 [RCS (CCA) Rules, 1958] के नियम 17 (Rule 17) के अंतर्गत लघु अनुशासनात्मक कार्यवाही संपादित की जाती है।

जहाँ नियम 16 के तहत विस्तृत साक्ष्य व मौखिक जांच (Oral Inquiry) की लंबी प्रक्रिया अपनाई जाती है, वहीं नियम 17 एक संक्षिप्त अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया (Summary Procedure) है। इसके बावजूद प्रायः अनुशासनिक प्राधिकारियों (Disciplinary Authorities), कार्यालयाध्यक्षों (DDO) और कर्मचारियों के मध्य यह संशय रहता है कि नियम 17 के तहत कौन-कौन सी लघु शास्तियां (Minor Penalties) अधिरोपित की जा सकती हैं, ज्ञापन (Memorandum) के साथ क्या दस्तावेज दिए जाते हैं, क्या नियम 17 में भी मौखिक जांच (Inquiry) की मांग की जा सकती है, परिनिन्दा (Censure) मिलने पर आगामी पदोन्नति (DPC) अथवा MACP पर कितने वर्षों तक प्रतिबंध रहता है, संचयी प्रभाव के बिना वेतन वृद्धि रोकने का वेतन पर क्या असर पड़ता है, तथा दण्ड आदेश के विरुद्ध अपील (Appeal under Rule 23) की क्या समय-सीमा है।

यह संदर्भ मार्गदर्शिका RCS (CCA) Rules, 1958 के नियम 14 एवं 17, कार्मिक विभाग (DoP) के आधिकारिक सतर्कता परिपत्रों, और राजस्थान सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण (RAT) के निर्णयों के आधार पर नियम 17 की विधिक प्रक्रिया, लघु शास्तियों के संवर्ग प्रभाव, अपील तंत्र और DDO सत्यापन नियमों का संपूर्ण विधिक व प्रशासनिक विश्लेषण प्रस्तुत करती है।


1. विधिक आधार एवं लघु शास्तियों की वैधानिक सूची (Statutory Framework & Minor Penalties)

  • RCS (CCA) Rules, 1958 — नियम 17: यह नियम लघु शास्तियां अधिरोपित करने हेतु संक्षिप्त एवं समयबद्ध प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) आधारित प्रक्रिया का विधान करता है।
  • नियम 14 के तहत लघु शास्तियां (Minor Penalties under Rule 14):
    1. परिनिन्दा (Censure): कर्मचारी के सेवा अभिलेख में आधिकारिक औपचारिक विधिक भर्त्सना/डांट दर्ज करना। यह सबसे हल्की किंतु अत्यंत गंभीर परिणामी प्रभाव वाली शास्ति है।
    2. वेतन वृद्धि रोकना — संचयी प्रभाव के बिना (Withholding of Increment without Cumulative Effect): एक निश्चित अवधि (उदा. 1 वर्ष या 2 वर्ष) के लिए वार्षिक वेतन वृद्धि रोकना, जो अवधि समाप्त होने पर स्वतः पुनर्बहाल हो जाती है (कम्युलेटिव प्रभाव के साथ रोकना वृहत शास्ति माना जाता है)।
    3. पदोन्नति रोकना (Withholding of Promotion): कर्मचारी को एक निश्चित अवधि के लिए पदोन्नति हेतु अपात्र घोषित करना।
    4. राजकीय वित्तीय हानि की वसूली (Recovery of Pecuniary Loss): कर्मचारी की घोर उपेक्षा अथवा सेवा नियमों के उल्लंघन के कारण सरकार को हुई प्रत्यक्ष वित्तीय हानि की उसके वेतन अथवा उपादान (Gratuity) से आंशिक या पूर्ण वसूली।

2. नियम 16 बनाम नियम 17: तुलनात्मक विधिक अंतर (Rule 16 vs. Rule 17)

तुलनात्मक बिंदु नियम 16 (वृहत शास्ति प्रक्रिया) नियम 17 (लघु शास्ति प्रक्रिया)
शास्ति का स्वरूप बर्खास्तगी, सेवा से हटाना, अनिवार्य सेवानिवृत्ति, पदावनति, संचयी वेतन वृद्धि रोकना। परिनिन्दा (Censure), बिना संचयी प्रभाव के वेतन वृद्धि रोकना, हानि की वसूली।
प्रारूप / प्रपत्र 4 वैधानिक प्रपत्र (Form 1, 2, 3, एवं 4) अनिवार्य। केवल एक औपचारिक **ज्ञापन (Memorandum)** तथा आरोपों का अभिकथन विवरण।
मौखिक जांच (Oral Inquiry) जांच अधिकारी (IO) व प्रस्तुतकर्ता अधिकारी (PO) की नियुक्ति अनिवार्य। सामान्यतः कोई मौखिक जांच नहीं; केवल लिखित जवाब के आधार पर निर्णय।
डिफेंस असिस्टेंट / गवाह गवाहों की पेशी, जिरह और डिफेंस असिस्टेंट का विधिक अधिकार। नियमित रूप से गवाहों का प्रतिपरीक्षण या डिफेंस असिस्टेंट अनुमत नहीं।
RPSC का परामर्श राजपत्रित अधिकारियों के मामलों में अनुच्छेद 320(3)(c) के तहत अनिवार्य। लघु शास्तियों के मामलों में सामान्यतः RPSC परामर्श की आवश्यकता नहीं होती।

3. नियम 17 की चरणबद्ध प्रशासनिक कार्यप्रणाली (Step-by-Step Procedure)

नियम 17 के तहत किसी कर्मचारी के विरुद्ध कार्यवाही करते समय सक्षम अनुशासनिक प्राधिकारी (Disciplinary Authority) द्वारा निम्नलिखित प्रक्रिया का पालन किया जाता है:

[चरण 1: नियम 17 ज्ञापन जारी करना (Memorandum under Rule 17)] → सक्षम प्राधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित ज्ञापन जारी किया जाता है, जिसके साथ आरोपों के आधारभूत तथ्यों का स्पष्ट विवरण (Statement of Imputations) संलग्न होता है।
[चरण 2: तामील एवं समय-सीमा (Service & Time Limit)] → ज्ञापन व्यक्तिगत रूप से अथवा डाक द्वारा तामील कराया जाता है। कर्मचारी को अपना लिखित प्रतिवाद (Written Representation) प्रस्तुत करने हेतु 15 दिवस का समय दिया जाता है।
[चरण 3: सुसंगत दस्तावेजों का अवलोकन] → यदि कर्मचारी जवाब तैयार करने हेतु संबंधित पत्रावली अथवा आदेशों के अवलोकन की प्रार्थना करता है, तो प्राधिकारी द्वारा उसे सुसंगत अभिलेख देखने की अनुमति दी जाती है।
[चरण 4: लिखित प्रतिवाद का परीक्षण] → अनुशासनिक प्राधिकारी कर्मचारी द्वारा प्रस्तुत लिखित जवाब, अभिलेखीय साक्ष्यों और तथ्यों का वस्तुनिष्ठ एवं निष्पक्ष परीक्षण करता है।
[चरण 5: असाधारण मामलों में मौखिक जांच (Discretionary Inquiry)] → यदि कर्मचारी तथ्यों का गंभीर खंडन करता है और प्राधिकारी को लगता है कि सच्चाई जानने हेतु साक्ष्य आवश्यक हैं, तो वह नियम 16(3) से (6) के तहत सीमित मौखिक जांच का आदेश दे सकता है (नियम 17(1) का परंतुक)।
[चरण 6: तर्कसंगत दण्ड आदेश (Speaking Final Order)] → प्राधिकारी बिना किसी पूर्वाग्रह के एक सकारण एवं तर्कसंगत आदेश पारित करता है—या तो आरोपों को निरस्त (Drop) करता है अथवा विहित लघु शास्ति अधिरोपित करता है।

4. परिनिन्दा (Censure) का पदोन्नति (DPC) एवं MACP पर विधिक प्रभाव

कार्मिक विभाग (DoP) के परिपत्रों एवं विभिन्न सेवा नियमों के अनुसार परिनिन्दा (Censure) का कर्मचारी के कॅरियर पर प्रत्यक्ष प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है:

पदोन्नति (Promotion / DPC) पर प्रभाव:

  • वरिष्ठता-सह-योग्यता (Seniority-cum-Merit): यदि पदोन्नति का आधार वरिष्ठता-सह-योग्यता है, तो जिस वर्ष परिनिन्दा का दण्ड दिया गया है, उस एक रिक्ति वर्ष (One Vacancy Year) के लिए कर्मचारी की पदोन्नति प्रभावित/स्थगित हो सकती है। डीपीसी द्वारा कर्मचारी के विगत 5 से 7 वर्षों के वार्षिक कार्य मूल्यांकन प्रतिवेदन (APAR) और सत्यनिष्ठा की समग्र समीक्षा की जाती है।
  • योग्यता आधार (Merit Basis): यदि पदोन्नति का आधार विशुद्ध योग्यता (Merit) है, तो परिनिन्दा होने पर कर्मचारी उस रिक्ति वर्ष में चयन से बाहर हो जाता है।
  • संशोधित MACP पर प्रभाव: वित्त विभाग की MACP अधिसूचना दिनांक 06.10.2023 के तहत 9, 18 अथवा 27 वर्ष की नियमित सेवा पूर्ण होने पर भी यदि कर्मचारी के विरुद्ध परिनिन्दा का दण्ड प्रभावी है, तो उस वित्तीय वर्ष में MACP स्वीकृति रोक दी जाती है अथवा परिनिन्दा की अवधि समाप्त होने के उपरांत आगामी तिथि से विचार किया जाता है।
  • विभागीय जांच लंबित होने पर सील कवर (Sealed Cover): यदि डीपीसी की बैठक के समय नियम 17 का ज्ञापन लंबित (Pending) है और अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है, तो डीपीसी द्वारा कर्मचारी की सिफारिश को 'सील कवर' लिफाफे में सुरक्षित रखा जाता है।

5. संचयी प्रभाव के बिना वेतन वृद्धि रोकने की गणितीय प्रक्रिया (Withholding of Increment)

इस शास्ति के तहत कर्मचारी को वित्तीय नुकसान तो होता है, परंतु दण्ड अवधि समाप्त होने पर उसका मूल वेतन उस स्तर पर पहुंच जाता है मानो कभी कोई दण्ड न दिया गया हो:

व्यावहारिक उदाहरण (Worked Example):

  • कर्मचारी की स्थिति: 1 वर्ष के लिए संचयी प्रभाव के बिना 1 वार्षिक वेतन वृद्धि रोकने का दण्ड।
  • वर्तमान मूल वेतन (1 जुलाई 2026 से पूर्व): ₹ 45,000/- (Pay Level L-11)
  • नियमित देय इंक्रीमेंट (1 जुलाई 2026): ₹ 46,400/- देय होना था, परंतु दण्ड प्रभावी होने के कारण 1 जुलाई 2026 को वेतन ₹ 45,000/- पर ही स्थिर रहेगा।
  • 1 जुलाई 2027 (दण्ड अवधि समाप्त होने पर): कर्मचारी को सामान्य रूप से दोनों वर्षों का लाभ देते हुए उसका वेतन सीधे आगामी सेल ₹ 47,800/- पर फिक्स कर दिया जाएगा।
  • वित्तीय प्रभाव: कर्मचारी को 01.07.2026 से 30.06.2027 के मध्य बढ़े हुए वेतन (₹ 1,400/- प्रतिमाह + DA) का वास्तविक वित्तीय नुकसान हुआ, परंतु भविष्य की सेवा हेतु उसकी स्थायी वरिष्ठता या अंतिम वेतन प्रभावित नहीं हुआ।

6. अपील एवं पुनरीक्षण का विधिक अधिकार (Appeal under Rule 23)

अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा नियम 17 के तहत पारित किसी भी दण्ड आदेश के विरुद्ध पीड़ित कर्मचारी को सेवा नियमों के तहत विधिक उपचार प्राप्त हैं:

  • अपील प्राधिकारी (Appellate Authority): दण्ड आदेश पारित करने वाले प्राधिकारी से ठीक उच्चतर प्रशासनिक प्राधिकारी (उदा. यदि DDO/विभागाध्यक्ष ने दण्ड दिया है तो प्रशासनिक विभाग/शासन सचिव) के समक्ष नियम 23 के तहत अपील प्रस्तुत की जा सकती है।
  • अपील प्रस्तुत करने की समय-सीमा: दण्ड आदेश कर्मचारी को व्यक्तिगत रूप से प्राप्त होने की तिथि से 3 माह (90 दिवस) के भीतर औपचारिक अपील प्रस्तुत करना विधिक रूप से अनिवार्य है।
  • राजस्थान सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण (Rajasthan Civil Services Appellate Tribunal - RAT): यदि विभागीय अपील निरस्त हो जाती है, तो कर्मचारी राजस्थान सिविल सेवा (अपीलीय अधिकरण) अधिनियम, 1976 के तहत जयपुर अथवा जोधपुर स्थित अधिकरण (Tribunal) के समक्ष 90 दिवस में अपील दायर कर सकता है।

7. अनुशासनिक प्राधिकारी एवं DDO हेतु नियम 17 ऑडिट चेकलिस्ट (DDO Checklist)

नियम 17 की पत्रावली का संधारण करते समय एवं दण्ड आदेश का वेतन व सेवा पुस्तिका पर क्रियान्वयन करते समय DDO को निम्नलिखित जांच अवश्य करनी चाहिए:

  • ☑ क्या नियम 17 का ज्ञापन उस संवर्ग के विधिक रूप से अधिकृत अनुशासनिक प्राधिकारी (Disciplinary Authority) द्वारा हस्ताक्षरित है?
  • ☑ क्या ज्ञापन के साथ आरोपों के आधारभूत तथ्यों का स्पष्ट एवं निश्चित विवरण (Statement of Imputations) संलग्न था?
  • ☑ क्या कर्मचारी को उसका लिखित अभिकथन प्रस्तुत करने हेतु पूर्ण 15 दिवस का विधिक अवसर प्रदान किया गया था?
  • ☑ क्या पारित किया गया अंतिम दण्ड आदेश एक सकारण आदेश (Speaking Order) है, जिसमें कर्मचारी के तर्कों का तार्किक खंडन किया गया है?
  • ☑ वेतन वृद्धि रोकने के मामले में क्या आदेश में स्पष्ट लिखा है कि यह रोक "संचयी प्रभाव के बिना" (Without Cumulative Effect) है?
  • ☑ क्या दण्ड आदेश की प्रमाणित प्रति कर्मचारी की सेवा पुस्तिका (Service Book) के चरित्र प्रविष्टि पृष्ठ पर लाल स्याही में आदेश क्रमांक एवं दिनांक सहित दर्ज कर ली गई है?

अस्वीकरण (Disclaimer): यह मार्गदर्शिका राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1958 के नियम 17, कार्मिक विभाग (DoP), राजस्थान सरकार द्वारा समय-समय पर जारी परिपत्रों तथा राजस्थान सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण के न्यायिक सिद्धांतों का एक विधिक व प्रशासनिक सार-संक्षेप है। किसी भी आधिकारिक अनुशासनात्मक निर्णय, विभागीय अपील अथवा न्यायिक वाद के संदर्भ में कार्मिक विभाग के मूल सेवा नियमों (dop.rajasthan.gov.in) को ही वैधानिक आधार माना जाए।

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