राजस्थान Two-Children Rule 2024-25: नए नियम और बड़े बदलाव

Mar 09, 2026
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Table of Contents

Rajasthan Two Children Policy for Government Employees: दो-संतान नियम, 01.06.2002 कट-ऑफ, पदोन्नति/ACP पर प्रभाव एवं नवीनतम संशोधन

राजस्थान सरकार के विभिन्न विभागों में सीधी भर्ती (Direct Recruitment), पदोन्नति (Promotion/DPC) तथा सुनिश्चित कॅरियर प्रगति (ACP) के वित्तीय अपग्रेडेशन के संदर्भ में दो-संतान संबंधी नियम (Two-Child Policy / Norm) अत्यंत महत्वपूर्ण एवं विधिक रूप से बाध्यकारी प्रावधान है।

राज्य सेवा के कर्मचारियों और प्रशासनिक अधिकारियों के मध्य अक्सर यह संशय रहता है कि क्या 01.06.2002 से पूर्व उत्पन्न संतानों की गणना की जाती है, तीसरी संतान होने पर पदोन्नति कितने वर्षों के लिए रोकी जाती है, ACP वित्तीय अपग्रेडेशन पर 3 वर्ष के डिफरमेंट (Deferment) का नियम कैसे लागू होता है, जुड़वां बच्चे होने अथवा पूर्व संतान के दिव्यांग होने पर क्या छूट मिलती है, तथा कार्मिक विभाग की अधिसूचनाओं व राजस्थान उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेशों की वर्तमान विधिक स्थिति क्या है।

यह विस्तृत संदर्भ मार्गदर्शिका कार्मिक विभाग (Department of Personnel - DoP), वित्त विभाग (नियम प्रभाग), विभिन्न सेवा संवर्ग नियमों (Various Service Rules) और न्यायिक निर्णयों के तहत राजस्थान के दो-संतान नियम, विधिक अपवादों, वित्तीय प्रभावों और DDO/DPC जांच प्रक्रिया का संपूर्ण प्रशासनिक व विधिक विश्लेषण प्रस्तुत करती है।

1. विधिक आधार एवं कट-ऑफ तिथि (Statutory Framework & Cut-off Date)

  • विधिक कट-ऑफ तिथि (01.06.2002):
    • राजस्थान सरकार द्वारा जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से विभिन्न सेवा नियमों में संशोधन कर यह प्रावधान किया गया कि 1 जून 2002 को या उसके पश्चात यदि किसी व्यक्ति/कर्मचारी के दो से अधिक जीवित बच्चे होते हैं, तो वह विधिक प्रतिबंधों के दायरे में आएगा।
  • 01.06.2002 से पूर्व की स्थिति (Grandfather Clause):
    • 1 जून 2002 से पूर्व उत्पन्न बच्चों की संख्या चाहे 2 से अधिक (जैसे 3 या 4) रही हो, तो भी कर्मचारी अपात्र नहीं माना जाता, बशर्ते 01.06.2002 के बाद संतानों की कुल संख्या में कोई वृद्धि न हुई हो।
  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पुष्टि:
    • माननीय उच्चतम न्यायालय ने राजस्थान पुलिस अधीनस्थ सेवा नियम, 1989 के नियम 24(4) तथा अन्य सेवा नियमों में निहित दो-संतान पात्रता शर्त को संविधान सम्मत एवं वैध ठहराते हुए पुष्टि की है कि यह नियम अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं करता।

2. सीधी भर्ती में दो-संतान नियम (Impact on Direct Recruitment)

सीधी भर्ती में आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों के लिए विधिक स्थिति अत्यंत स्पष्ट है:

पारिवारिक स्थिति (Family Composition) सीधी भर्ती हेतु विधिक स्थिति (Eligibility) नियम एवं शर्तें
01.06.2002 के बाद केवल 2 या उससे कम जीवित संतान पूर्णतः पात्र (Eligible) अभ्यर्थी नियमित नियुक्ति हेतु पूर्ण योग्य माना जाता है।
01.06.2002 को या उसके बाद 3 या अधिक जीवित संतान पूर्णतः अपात्र (Disqualified) सेवा नियमों के अनुसार अभ्यर्थी सरकारी सेवा में नियुक्ति हेतु अयोग्य माना जाता है।
01.06.2002 से पूर्व 3 संतान + बाद में कोई नया जन्म नहीं पात्र (Eligible) चूंकि 01.06.2002 के बाद संख्या में कोई वृद्धि नहीं हुई, अतः वह अपात्र नहीं होगा।
01.06.2002 से पूर्व 2 संतान + बाद में तीसरी संतान अपात्र (Disqualified) कट-ऑफ तिथि के बाद संख्या बढ़कर 3 होने पर भर्ती से अयोग्य।

3. पदोन्नति (Promotion / DPC) पर तीसरी संतान का प्रभाव

पहले से सेवारत राज्य कर्मचारियों के मामले में यदि 01.06.2002 के बाद तीसरी संतान उत्पन्न होती है, तो पदोन्नति के संबंध में निम्नलिखित विधिक व्यवस्था लागू होती है:

  1. 3 वर्ष का पदोन्नति डिफरमेंट (3-Year Delay in Promotion):
    1. सामान्य सेवा नियमों के परंतुक (Proviso) के अनुसार यदि किसी कर्मचारी के 01.06.2002 को या उसके बाद दो से अधिक संतान होती हैं, तो वह उस तिथि से 3 वर्ष (Three Recruitment / DPC Years) के लिए पदोन्नति हेतु विचारणीय क्षेत्र (Zone of Consideration) से बाहर रहेगा।
  2. वरिष्ठता पर प्रभाव (Loss of Seniority):
    1. 3 वर्ष की प्रतिबंध अवधि समाप्त होने के बाद जब उसकी डीपीसी होती है, तो उसे उस बाद के वर्ष की अंतर-वरिष्ठता (Inter-se Seniority) में स्थान मिलता है, जिससे उसका पूर्व बैच के साथियों से स्थायी रूप से कनिष्ठ (Junior) होने का जोखिम रहता है।
  3. 16 मार्च 2023 की अधिसूचना एवं न्यायिक स्थिति:
    1. राज्य सरकार (DoP) ने 16.03.2023 को एक अधिसूचना जारी कर पदोन्नति में 3 साल के डिफरमेंट के बाद पूर्व वरिष्ठता बहाल करने संबंधी कुछ शिथिलन दिए थे।
    2. यद्यपि, राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा इस अधिसूचना के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक (Interim Stay) एवं न्यायिक समीक्षा के आदेश दिए गए। अतः वर्तमान में डीपीसी बैठकों में 3 वर्ष के प्रतिबंध एवं वरिष्ठता के मूल सेवा नियमों का ही कड़ाई से परीक्षण किया जाता है।

4. सुनिश्चित कॅरियर प्रगति (ACP) पर प्रभाव

वित्त विभाग (नियम प्रभाग) के आदेश संख्या F. 15(1)FD/Rules/2013 दिनांक 06.10.2015 तथा संशोधित परिपत्रों के अनुसार ACP वित्तीय अपग्रेडेशन (9, 18, 27 वर्ष) पर दो-संतान नियम का प्रभाव निम्नानुसार है:

  • 3 वर्ष के लिए ACP का आस्थगन (Deferment):
    • यदि किसी कर्मचारी के 01.06.2002 को या उसके बाद 2 से अधिक संतान होती हैं, तो उसकी आगामी देय ACP को देय तिथि (Due Date) से 3 वर्ष के लिए स्थगित (Deferred) कर दिया जाता है।
  • परवर्ती वित्तीय अपग्रेडेशन पर परिणामी प्रभाव (Consequential Effect):
    • वित्त विभाग के आदेश के अनुसार यह 3 वर्ष का विलंब केवल उसी एक ACP पर नहीं रहता, बल्कि कर्मचारी की आगामी समस्त ACPs (जैसे द्वितीय अथवा तृतीय ACP) भी स्वतः 3-3 वर्ष आगे खिसक जाती हैं।
  • वेतन निर्धारण एवं एरियर: आस्थगित 3 वर्ष की अवधि का कोई काल्पनिक या वास्तविक एरियर देय नहीं होता।

5. विधिक अपवाद एवं विशेष परिस्थितियाँ (Statutory Exemptions)

सेवा नियमों में कुछ विशिष्ट मानवीय एवं जैविक परिस्थितियों को दो-संतान की दंडात्मक गणना से छूट प्रदान की गई है:

A. जुड़वां प्रसव का नियम (Twin Delivery Exemption):

  • यदि किसी कर्मचारी के प्रथम प्रसव (First Delivery) से 1 जीवित संतान है, और द्वितीय प्रसव (Second Delivery) में जुड़वां बच्चे (Twins) जन्म लेते हैं:
  • तो कुल संतानों की संख्या 3 होने के बावजूद इसे नियम का उल्लंघन नहीं माना जाएगा और कर्मचारी पदोन्नति/नियुक्ति हेतु पात्र रहेगा।
  • परंतु: यदि प्रथम प्रसव में ही जुड़वां बच्चे (2 संतान) हो चुके हों और द्वितीय प्रसव में पुनः 1 संतान जन्म लेती है, तो यह नियम का उल्लंघन माना जाएगा।

B. दिव्यांग संतान का अपवाद (Disabled Child Exclusion):

  • वित्त विभाग एवं कार्मिक विभाग के संशोधित आदेशों के अनुसार यदि किसी कर्मचारी की पूर्व प्रसव से उत्पन्न संतान गंभीर दिव्यांगता (Benchmark Disability) से ग्रसित है (सक्षम मेडिकल बोर्ड का प्रमाण पत्र), तो अगली संतान के जन्म पर दिव्यांग संतान को संतानों की विधिक संख्या में नहीं गिना जाता।

C. दत्तक ग्रहण (Adoption Rules):

  • यदि किसी कर्मचारी के पास पहले से 2 या अधिक जीवित जैविक संतानें हैं, और वह हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत कोई अन्य बच्चा गोद लेता है, तो विधिक संतानों की संख्या में वृद्धि मानी जाती है।
  • अनाथालय से विधिक प्रक्रिया द्वारा बच्चे को गोद लेने के मामलों में विशिष्ट प्रशासनिक व्याख्या लागू होती है।

6. अवकाश एवं अन्य परिलाभों पर प्रभाव (Leave Entitlements)

  • प्रसूति अवकाश (Maternity Leave - RSR Rule 103): 180 दिन का सवेतन मातृत्व अवकाश केवल तब तक देय होता है जब तक महिला कर्मचारी के 2 से कम जीवित बच्चे हों। तीसरी संतान के प्रसव पर नियम 103 के तहत प्रसूति अवकाश देय नहीं होता।
  • पितृत्व अवकाश (Paternity Leave - RSR Rule 103A): पुरुष कर्मचारी को 15 दिन का सवेतन पितृत्व अवकाश भी केवल 2 से कम जीवित संतानों तक ही अनुमत है।
  • चाइल्ड केयर लीव (CCL - RSR Rule 103C): 730 दिन की संपूर्ण CCL पात्रता केवल प्रथम दो जीवित संतानों की देखभाल हेतु ही स्वीकृत की जा सकती है।

7. DPC प्रकोष्ठ एवं DDO हेतु सत्यापन चेकलिस्ट (Inspection Checklist)

पदोन्नति (DPC), ACP स्वीकृति अथवा नियमित वेतन आहरण के समय DDO/संस्था प्रधान को निम्नलिखित बिंदुओं की अनिवार्य जांच करनी चाहिए:

  • क्या कर्मचारी से 01.06.2002 को एवं उसके पश्चात जीवित संतानों के नाम, लिंग व जन्म तिथि युक्त शपथ पत्र / स्व-घोषणा पत्र प्राप्त कर लिया गया है?
  • यदि 01.06.2002 के बाद तीसरी संतान का जन्म हुआ है, तो क्या आगामी ACP को 3 वर्ष के लिए आस्थगित (Defer) करने का कार्यालय आदेश जारी किया गया है?
  • क्या डीपीसी बैठकों में तीसरी संतान वाले कार्मिक को 3 वर्ष की प्रतिबंध अवधि के दौरान विचारणीय क्षेत्र (Zone of Consideration) से बाहर रखा गया है?
  • क्या जुड़वां प्रसव के मामले में अधिकृत अस्पताल का डिस्चार्ज टिकट व मेडिकल प्रमाण पत्र संलग्न है जिससे सिद्ध हो कि एक ही प्रसव में दो बच्चे जन्मे थे?
  • सेवा पुस्तिका (Service Book) के पारिवारिक विवरण पृष्ठ पर समस्त संतानों की सही जन्म तिथियों का अंकन DDO के प्रतिहस्ताक्षर सहित सुरक्षित है?

अस्वीकरण (Disclaimer): यह मार्गदर्शिका कार्मिक विभाग (DoP), वित्त विभाग, राजस्थान सरकार द्वारा जारी विभिन्न सेवा नियमों, संशोधनों एवं परिपत्रों का एक विधिक व प्रशासनिक सार-संक्षेप है। किसी भी आधिकारिक निर्णय, पदोन्नति विवाद अथवा न्यायिक प्रक्रिया के संदर्भ में कार्मिक विभाग के मूल सेवा नियमों एवं आधिकारिक परिपत्रों (dop.rajasthan.gov.in) को ही वैधानिक आधार माना जाए।

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